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विस्थापित मज़दूर
हम विस्थापित मज़दूर हुए मज़बूर चले घर जैसे तैसे ?
सहनशक्ति लाचार हुए बेज़ार सहे हैं ऐसे ऐसे ?
गया रोजगार हुए बेगार चलेगा घर अब कैसे ?
दुःख हैं अपार लुटा घर बार चूल्हे जले अब कैसे ?
लिए संताप चले उस पार जठराग्नि मिटाये कैसे ?
©#कुमार
