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Kumar Bhupesh
Kumar BhupeshCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·1 min read·

विस्थापित मज़दूर

हम विस्थापित मज़दूर हुए मज़बूर चले घर जैसे तैसे ?

सहनशक्ति लाचार हुए बेज़ार सहे हैं ऐसे ऐसे ?

गया रोजगार हुए बेगार चलेगा घर अब कैसे ?

दुःख हैं अपार लुटा घर बार चूल्हे जले अब कैसे ?

लिए संताप चले उस पार जठराग्नि मिटाये कैसे ?

©#कुमार