हम यंगिस्तान में हैं या कब्रिस्तान में?
2011 के जनगणना का आँकड़ा देखकर हम सभी भारतीय सीना ठोककर कहते फिरते है कि भारत एक युवा देश है।हमारी आधी से अधिक आबादी युवा हैं,यानि 15 साल से 35 साल के बीच के हैं।यह साकारात्मक सोच विकसित करता है और इसमें खोंट निकालकर मैं आपकी भावना को नाकारात्मकता से भरना नहीं चाहता हूँ।इस युवा देश के इन युवाओं को लेकर मेरी कुछ चिंता है।अगर मेरी इन चिंताओं को आप नाकारात्मक्ता से जोड़कर ना देखें तो इन चिंताओं को जाहिर करने का अधिकार मैं आपलोगों से माँगता हूँ।
अपनी बात शुरू करने से पहले मैं इस लेख के हेडिंग में प्रयुक्त शब्दों को परिभाषित कर देना चाहता हूँ।यंगिस्तान से मेरा तात्पर्य ऐसे वतन से है, जहाँ गर्म खून और ठंडे दिमाग वाले,यानि जोशीले और समझदार लोग रहते हों।जहाँ नई सोच,नई उम्मीद,नये उत्साह के साथ सुबह होती हो और विजयी मुस्कान के साथ लोग अपने बिस्तर पर जाते हों।दूसरी तरफ,कब्रिस्तान से मेरा तात्पर्य ऐसे सुनसान से है,जहाँ दो मिनट वक़्त गुजारने का जी ना करे।जहाँ मातम हो,डर हो,कब क्या हो जाये इस आशंका में सहमे हुए लोग हों।
अब मैं अपने लेख के प्रश्न पर आता हूँ कि हमारा देश कहाँ है-यंगिस्तान में या कब्रिस्तान में?अगर आपका उत्तर यंगिस्तान है तो इसमें आंशिक त्रुटि है।क्योंकि मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि वर्तमान समय में औसत युवा 20 साल से 30 साल कि उम्र में ही मर जा रहे हैं;हाँ उन्हें 75 साल से 80 साल के बीच दफनाया भले जाता है।(इस डबल मीनिंग (Double Meaning) और विचित्र बात के लिए हमें क्षमा करें।
दरअसल इन युवाओं कि पहली मौत इनके अरमानों की,इनके ख्वाबों की,लव अफेयर की,कैरियर में नाकामयाबी की,इत्यादि की होती है।युवाओं के बीच एक चर्चित सा डॉयलॉग मशहूर है-\"जब बच्चे थे तो बड़े होने की बड़ी जिद थी।अब बड़े हो गए है तो लगता है टूटे सपने और थके हुए मन से अच्छा तो बचपन के टूटे हुए खिलौने और स्कूल के होम वर्क थे। जिंदगी में हम जो चाहते है वह सब कुछ वैसा ही नहीं मिल पाता है जैसे हमने चाहा था।जैसा हम सोचते है हु-ब-हु हमारी जिंदगी वैसी कभी नहीं बन पाती;या तो उससे अच्छी बन जाती है या उससे थोड़ी खराब।
इन प्लस,माईनस से अपने-आप को जो समझाने में सफल हो जाता है,वह नहीं मरता है।अगर कोई कहीं असफल भी हो गया लेकिन अपनी इच्छाशक्ति के बल पर उसने अपनी आवश्यकताएँ कम कर ली,परिस्थितियों से तालमेल बिठाने में कामयाब हो गया तो भी वह नहीं मरेगा।अगर झक मारने की आदत पड़ गयी,पश्चाताप करते रहने,परिवार की समस्या,आर्थिक समस्या,प्रेम समस्या,इज्जत समस्या,आदि गिनने में दिन बीतने लगा तो समझो मौत होनी शुरू हो गयी।ऐसे लोग रोज मरते है।जब ये सोने के लिए बिस्तर पर जाते है तो इनका मन शरीर में नहीं रहता।समस्याओं में उलझा रहता है।फलतः नींद नहीं आती।दायें करवट में समस्या-क तो बायीं करवट में समस्या-ख।सोने के लिए अपने मन को अपने शरीर में लाना पड़ता है।पूरे शरीर को सर से पाव तक स्कैन करना पड़ता है की किस भाग को रेस्ट चाहिए।बाँकी काम जागने के बाद होगा ,ऐसा अभ्यास करें तो अच्छी नींद ले पाएंगे।
दूसरी मौत,शरीर से प्राण निकल जाने वाला होता है।अब हम कब्रिस्तान जाने के योग्य हो जाते है।
हम सभी को अपना मूल्यांकन करना चाहिए की हम जिंदा जी रहे है या मुर्दा जी रहे है।हम जिंदगी जी रहे है या जिंदगी काट रहे है। सफलता-असफलता से परे,हार-जीत से परे,हानि-लाभ से परे,मान-अपमान से परे एक हरफनमौला जिंदगी हम सब की होनी चाहिए।प्रत्येक दिन कुछ ऐसे पल बिताने चाहिए जिससे हमारी रूह को सुकून मिले।हम से कोई नहीं जानता की हमारी आखिरी साँस कब तक है।ऐसा ना हो हम सफर में ही स्वर्ग-सिधार जाएँ।
अपने लिए कम से कम आधे-घंटे निकालिए।एक एकांत खोजिए,कहीं नहीं तो अपने सोने की जगह ही सही,आँखें बंद करके अपने साँसों की रफ्तार को महसूस करिए,अपने शरीर में बहने वाले खून को महसूस करिए,धड़कते दिल पर हाथ रखकर उसे धन्यवाद दीजिये जिसने ये मशीन आपमें फिट करी है।मैं आपको धार्मिक,आध्यात्मिक,सांप्रदायिक कुछ भी नहीं बना रहा हूँ।मैं आपको सिर्फ यह अहसास दिला रहा हूँ की आप एक जीवित प्राणी है,आप मशीन नहीं है।मशीनों के साथ काम करते-करते ,डिवाइस के साथ खेलते-खेलते आप निर्जीव मत बन जाइए।
