ये कौन सा तरीका है तेरे जीने का
जीवनभर वो जीवनधर की चरणसेवा कर जाता है। उसकी अभीप्साओं का तू प्रतिकारी बन जाता है ॥ क्या ये ही मोल है एक गरीब के पसीने का, ये कौन-सा तरीका है तेरे जीने का।
गुलामजादों पर तू क्यों अपना कहर बरसाता है। अमीरजादों से तू क्यों स्व को गोशानशीन बनवाता है॥ क्या ये ही पोल है तेरे इस विशुद्ध नगीने का, ये कौन-सा तरीका है तेरे जीने का।
अपने ओछोपन से तू क्यों इतना इठलाता है। खुद की पहचान बता तू बड़बोला कहलाता है॥ क्या ये ही राज है तेरा इस गात को सँजोने का, ये कौन-सा तरीका है तेरे जीने का।
अंहकार को प्रदर्शित कर तू दुर्बुद्धि कहलाता है। दम्भिता को अपना तू अश्कों में बह जाता है ॥ क्या ये ही वो एहसास है तेरा इस तरह से रोने का, ये कौन-सा तरीका है तेरे जीने का।
गम को भुलाने के लिये तू इक प्याला ले आता है। मधुशाला के ठेके पे तू साकी सा बन जाता है ॥ क्या ये ही वो राज है तेरे यूँ अहर्निश पीने का, ये कौन-सा तरीका है तेरे जीने का। Alive words of Akarshit.
©#आकर्षित मौर्य
