Ashutosh Kumar
Ashutosh KumarCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·1 min read·1·

तुम ही हो अबला,तुम ही हो सबला

तू हजारो मिल दूर है मुझसे ,पर तुझे रोज जीता हु मैं, सब पूछते है मुझसे ,तू कौन, मैं कहता ये प्रश्न माँ से खुद ही पूछता हूं मैं, हर स्त्री में रूप तुम्हारा,धवल श्वेत की मूर्ति तुम,

तुम्ही गायत्री तुम्ही हो गंगा, वीणा धारित श्वेता तुम, तुम ही हो मुझमे मैं ही तुम हो ,अंग अंग में रमित रमा हो, नारायणी भी तुम हो,रमा भी तुम हो,तुम ही हो जगदम्बा तुम, हरती क्लेश हो ,रचती सृष्टि नूतन तुम

तम को छीन भिन कर देती नव भक्ति भी तुम तुम ही हो अबला तुम ही हो सबला, तुम ही शिव की शक्ति हो शून्य भी तुम हो,सृजन भी तुम हो,रुद्र की संहारिणी भी तुम हो, काल भी तुम हो ,महाकाल भी तुम हो सविता का प्रकाश भी तुम हो,

उषा की प्रथम किरण हो,अंधकार की काल रात्रि भी तुम हो, तुमसे सब है ,सब ही तुम हो,तुम हो सबमें तुम सबसे परे, गर्व भी तुम,गर्भ भी तुम,शिशु ही प्रथम रुदन भी तुम हो, जो विस्तारित वो भी तुम,जो समाहित वो भी तुम,

नाद योग की धुन भी तुम हो,अनहद का नाद भी तुम हो, तुम हो शीतल ,तुम हो प्रांजल, गंगा की कल कल तुम हो, तुम हो राधा तुम ही हो रुक्मणि ,मीरा की तान भी तुम हो, तुम ही हो सबकुछ ,सबकुछ तुम हो ,जीवन का संगीत तुम्ही हो,

माँ कह लो,प्रीत कह लो,राखी की डोर तुम्ही हो, पायल की झंकार तुम्ही हो,मेरा घर संसार तुम्ही,हो घर की तुलसी,चौरे का गोबर,पिता की दुलार तुम्ही हो, मैं कहता हूं,सब कुछ का आधार तुम्ही हो, सब कुछ का आधार तुम्ही हो।