युवा प्रत्यंचा उठा रहे हैं
आज कल वो मगरूर होते जा रहे हैं । अपने ही अपनों से दूर होते जा रहे हैं । कदम कदम पर अभिमान के ऊँचे महल बना रहे हैं । सौहरत के मद में होकर चूर ,रिश्ते कूचले जा रहे हैं । फूल सी कलियों को बेरहमी से रौदे जा रहे हैं । कुछ नादान, मानवी भेडियों को भी पनाह मूहैया करा रहे हैं । सियासत के जागीरदार लूटती अस्मद को भी राजनीतिक ढाल बना रहे हैं । तू तू मैं मैं के भँवर में जनता को उलझा रहे हैं । सियासत के भूखे ,झूठी संवेदना दिखा रहे हैं । साबूत ढूंढने वाले ही ,अब साबूत ठिकाने लगा रहे हैं । तार तार हो रही पूर्खो की अमिट कहानी ,अब यहाँ अस्मद के किम्मत लगाये जा रहे हैं । आओ करे चिंतन जरा, हम राष्ट्र को किस ओर लिये जा रहे हैं? क्या कुर्सी के भूखों के भरोसे हम विश्व गुरू होने के सपने सजा रहे हैं? आओ करे अन्त दुष्प्रवृतियों का, जो राष्ट्र के सम्मान को शर्मसार करते जा रहे हैं । उठो उठो युवा,अब धरा अंबर तुम्हें पुकार रहे हैं । कह दो उन दरिन्दों से, अब बाज आओ कूकर्मो से, अब युवा प्रत्यंचा उठा रहे हैं ।
©#सतीश
