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जिन्दगी का सफर
बुझ गई है हर लौ जिन्दगी की देखो, अभी सीने में सांसों का धुआँ बाकी है।
अभी तो जमीं पर चलना सीखा है साहब! उड़ानों के लिये तो सारा आसमाँ बाकी है॥
दुवाओं में माँगा है अपने सपनों का सफर, अभी इन राहों की मंजिलों का आशियाँ बाकी है॥
जीवन की मोड़ों पर कहीं भटकूँ न मैं, मेरे हौसलों पर खुदा का मेहरबाँ बाकी है॥
साहस रखो नेकी की राह पर चलने का, तू चल तो सही!अभी तो पूरा कारवाँ बाकी है॥
जिन्दगी का सफर एक परीक्षाओं का दौर है, पूछो खुद से बता और कितने इम्तिहाँ बाकी हैं॥ Alive words of Akarshit.
©#आकर्षित मौर्य
