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Siddharth Rana
Siddharth RanaCourseLiteraturePoetry
9 Feb 2021·1 min read·

क्या हमें अपनी आध्यात्मिकता समझ में आती है?

आध्यात्मिकता क्या है? क्या वह लिखी जा सकती है, बोली जा सकती है दिखाई जा सकती है? वह क्या है? निश्चित ही विद्वान पुरुष अक्सर ऐसे कृत कर देते हैं कि उनकी आध्यात्मिकता पर प्रश्न उठते हैं। मूर्ख मनुष्य में यह आध्यात्मिकता ज्यादा प्रतीत होती है। यह तो लिखने वाले का दृष्टिकोण है परन्तु क्या इस आध्यात्मिकता का कोई मापदंड है। क्या कोई ऐसा तरीका है जिससे हर व्यक्ति को आंका जा सके।

उत्तर मिलता है नहीं। यह उत्तर किताबी ज्ञान से उद्भूत नहीं होता, यह सहज अनुभव है। अपनी सामर्थ्य को हम सांसारिक मापदंडों से तौलते हैं तथा भ्रमरूपी चक्र में फंसे रह जाते हैं। हम आत्मा हैं यह बात कोई हमें बताए या हमें ऐसी अनुभूति हो इन दोनों प्रसंगों में भेद है। निश्चित ही जिस प्रकार आज शिक्षा व्यवस्था मनुष्य को रॉबट बना रही है यह कहना उचित ही होगा कि हमारी जीवन को गहराई से अनुभव करने की क्षमता खो सी गई है।

अपने बारे में हम स्पष्ट नहीं हैं। जब हम अपने आप को साधना में अनुभव करते हैं तो यही लगता है कि कितना बंधन हमारी चेतना में विद्यमान है तथा हमारा ध्येय क्या होना चाहिए। बंधन जब तक जीवन है रहेगा क्योंकि वह उस देह तथा इसके तथाकथित स्वामी मन की प्रकृति है। सबसे जरूरी यही बात प्रतीत होती है कि अपनी क्षमताओं को संसार बंधन की संकरी गलियों से आगे बढ़ाया जाए।

जो हम अपने में विकसित करना चाहते हैं वह हमारे संकल्प विकल्प से नहीं संभव है क्योंकि वहां पर हमारी निम्न प्रवृत्तियां घुसपैठ कर जाती हैं। अपने अस्तित्व का आधार ही वास्तविक मार्गदर्शक है।

© सिद्धार्थ राणा