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अगस्त की काली रात
लगा रखी थी वर्षों से आस मै बस सोच रही थी एक बात कब आएगी वो रात छूटेगी आंचल मेरी ये छोड़ जाएगी अपनी राष्ट्र।
बंजर भूमि से फटती जमीं से मैला सा तन मेरा, खुला बदन मेरा इन छोटी-छोटी आंखों से उदासी भरी पडोसों से सोचा था लेकर आएगा मुन्ना खुशियों की सौगात वो तो कर गया बटवारे की बात तोड़वा लिया ढाका इस्लामाबाद मैं बोल रही थी मत तोड़ो राष्ट्र पर क्यों माने जिन्ना मेरी बात इसमें था अंग्रेजों का हाथ कर लिया बटवारा रातों रात याद है वो अगस्त की काली रात खंडित कर दिया पूरा राष्ट्र अभी समाने है तीनों लाल कोई रखे मां की मांगे लाल तो कोई अपनी जमीं को लाल।
©अमन कुमार (विक्की)
