अंहकार और बलिदान
तुम्हें अपने कामयाबी पर हुआ अभिमान है। पीछे मुड़कर देखो जरा,कितनों का भेंट चढ़ा अरमान है। तेरे बुलंदियों के नींव में ,आज भी दीनता के पाँव तले सिसकता कोई इंसान है। अपने जीवन का हर क्षण वार दिया तुझे, तभी तेरे हिस्से हौसलों की उड़ान है। लहूलुहान हुए होंगे पाँव किसी के, किसी के लहू के आखरी कतरें तक बहे होगे। दिए होंगे स्वयं के निवाले तुम्हें,खुद कई दिनों खाली पेट रहे होंगे । वेदना, व्यथा का सागर अपने सीने में दफ्न किये होंगे । त्रिपुरारी ने पिया बिष एक बार,वे हर कदम पर बिष का प्याला पिये होंगे। स्वयं का सर्वस्व न्योछावर कर ,तुम्हें सफलता के आधार दिए होंगे। धन के मद में चूर वो मगरूर कहते है- मेरे जीवन में उनका स्थान क्या है? मैंने पाया सबकुछ अपने बदौलत, उनका योगदान क्या है? उन्होंने तो अपना फर्ज निभाया, इसमें बलिदान क्या है? मैं भी किया वही, जो जहां कर रहा है तो मेरा अपमान क्या है? मेरा भी प्रश्न एक, उनके वजूद के वगैर तुम्हारी पहचान क्या है? पुरखों के अद्वितीय त्याग से पोषित इस धरा पर तुम्हारा काम क्या है? ©सतीश कुमार पाण्डेय
