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अहसास
सर्द हवाओं से छूकर, रूह जब सिहरती है..
उमड़ती घटाओं को देखकर, आँखें जब बंद होती है..
नदी की कल-कल से, मन जब विकल होता है..
भीगी माटी को कुरेदकर उँगलियाँ, न जाने क्या महसूस करती हैं।
© राहुल देवाशीष
सर्द हवाओं से छूकर, रूह जब सिहरती है..
उमड़ती घटाओं को देखकर, आँखें जब बंद होती है..
नदी की कल-कल से, मन जब विकल होता है..
भीगी माटी को कुरेदकर उँगलियाँ, न जाने क्या महसूस करती हैं।
© राहुल देवाशीष