अकेलापन
अकेला हूं, बैठा एक कमरे की चारदीवारी में। बिल्कुल अकेला, नहीं मालूम जिदंगी के आगे के पल। निराश नहीं, अकेला हूं, बैठा हूं, एक दूर शांत टापू पर।
आदमी तो है, पूछने वाले तो है, पर पूछता कोई नहीं। जागता कोई नहीं, बस मै ही हूं, बहालता अपने को। खोजता हूं, ढूंढता हूं अपने को, इस समंदर के अकेलापन में।
भटक तो नहीं रहा, जिन्दगी की भुलभुलैया में। क्या मै कर पा रहा हूं, इस जीवन के अकेलापन से। अकेला जरूर हूं, ईश्वर की आश जरूर है।
पाने की इच्छा व खोने की लालसा जहां मित जाए। मै जीवन की उसी फलक पे ठहरा, निहार रहा हूं। क्या खोया, क्या पाया तनिक भी फिक्र नहीं।
जीवन बिल्कुल निः शब्द है, निराश नहीं। अपने अतः को टटोलता, जीवन के ये पल। स्वयं की खोज तो नहीं, एक मौका खुद को पहचानने की।
कूप अंधेरा है, एक बंगले के एक कोने में, चार दिवारी तले। खोज रहा ब्रह्माण्ड की गहराई को, इतना छोटा एक कण मात्र भी नहीं। फिर भी एक विश्वास है , जिदंगी के ये पल भी अच्छे, खुश नुमा है।
अकेला हूं, बैठा एक कमरे की चारदीवारी में। बिल्कुल अकेला, नहीं मालूम जिदंगी के आगे के पल। निराश नहीं, अकेला हूं, बैठा हूं, एक दूर शांत टापू पर।
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©#मिथिलेश कुमार
