← PrevNext →
Mithilesh Kumar
Mithilesh KumarCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·1 min read·

आंसू

बेशकिमती है, ये आंसू। व्यर्थ इसे बहाया, ना करो। एक बूंद आंसू, अक्श ऐसे। बनते है, कई बूंद लहू से।

खून के आंसू, रुलाया ना करो। यह एक बूंद आंसू नहीं, अंतरात्मा की आवाज है। अनदेखी कर देते बस, समाज की बेखुदी ऐसी।

मानव कठोर इतना कब से था, निर्दय कब से था। मार दिए जाते, निहशंस निर्दोष प्राणी। बन जाते किसी का निवाला, मानव इतना भूखा कब था। बन जाए दीवार की शोभा, मानव इतना स्वार्थी कब था।

खून के आंसू, रुलाया ना करो। उन बेसहाय जीवो, की किया गलती है। मानव इतना कभी ना भूखा था, ना ही निष्ठुर। मानव मूल्यों में हरास क्यों, क्यों बन बैठे इतने इच्छा लोलूप।

मानव भी ऐसे, हजम कर जाते इसे। कभी कहते, इसकी टेस्ट है, wow! इसके स्वाद की क्या बात है, wow! बेचारे निर्दोष बेसाहय जीव, क्या गलती है।

स्वाद के नाम पर, भुखमरी को बुलावा क्या जायज है। मार रहे निर्दोष जीवो, ऐसे ही क्या ठीक है। इसमें कहीं भी क्या अंतर है, आत्मा तो एक है। क्यों रुलाते हम, उन्हे खून के आंसू। हरेक की आंसू की कीमत है।

बेशकिमती है, ये आंसू। व्यर्थ इसे बहाया, ना करो। एक बूंद आंसू, अक्श ऐसे। बनते है, कई बूंद लहू से।

©#मिथिलेश कुमार