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बाल मजदूरी
कंधों पर जिम्मेदारियों की बोझ दिखाकर भविष्य की समस्याओं को गिनाना और मीलों दूर भगाना।
खिलने-खेलने की उम्र में, स्कूल के चौखट की दिशा को मोड़कर मजदूरी की जमात में, शामिल होने के लिए प्रेरित करना।
अल्पायु में, इस दुष्चक्र में फँसाकर खिलौने के जगह भारी औजार का पकड़ा देना।
खादानों में,ईट-भट्टों पर चंद रुपयों के लिए मूक बचपन को दाँव पर लगा देना।
नन्हें हाथों की मजदूरी से बेसुध घर में गमगीन परिवारों का चिराग जलाने वाली वो मजबूरी की पाठ पढ़ाना "बाल मजदूरी" को बढ़ावा देती है।
©अमन कुमार(विक्की)
