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Kumar Bhupesh
Kumar BhupeshCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·1 min read·

बालदिवस

हम इधर बाल-दिवस मनाते रह गए, वो उधर भ्रूण-हत्या कराते रह गए !

हम इधर कानून बनाते रह गए, वो उधर बाल मजदूरी कराते रह गए !

किताबें होनी थी जिनके हाथों में, वो ग़रीबी का बोझ उठाते रह गए ! <!--more-- स्कूलों में रजिस्टर तो भर गए बच्चों से, पर, वो अपनी बारी आजमाते रह गए !

हम बाल-दिवस मनाते रह गए, वो आज़ादी के सपने सजाते रह गए !

©#कुमार