बेशर्म जनता
कोरोना की ये वर्तमान लहर पिछले साल की भांति ही भयावह रूप धारण करती जा रही है। और, जनता हैं कि अपनी सुरक्षा के लिए सरकारी नियमों का पालन ही नहीं कर रही हैं ! आख़िर सरकार करें तो क्या करें, जहाँ बाज़ारों में भीड़ देखकर सरकार को घबराहट होती है ? वहीं जनता हैं कि होली जैसे अनावश्यक त्योहारों की आड़ लेकर समारोह करने की सोच रही है ! लोग होली मंगल मिलन जैसे बेहूदे कामों के लिये इकट्ठा होने की सोच रही हैं। शर्म आनी चाहिए इस देश की जनता को ! जब देश में इतनी बड़ी आपदा आई हैं तो लोग घर पर नहीं रह सकते क्या ? सरकार को मजबूर होकर जनहित में सख्ती करनी पड़ती है ? विवश होकर पुलिसवालों को कहना पड़ता है कि जो भी बिना मास्क दिखे उसे धर लो और जुर्माना वसूलों ? आपकी चिंता सरकार करती हैं आपके लिए इतने सारे गाइड लाइन जारी कर रखी हैं और जनता हैं कि सरकार की सुनती ही नहीं ? लज्जा आनी चाहिए ऐसे लोगों को ? और, देखो कैसी बेशर्म हैं जनता जिन्हें कोरोना से डर ही नहीं लगता ? अरे मूर्खो, अपनी नहीं तो कम से कम सरकार की ही परवाह कर लो ! इस देश के महान राजनेता अपनी जान पर खेलकर लाखों लोगों की रैलियां कर रहे हैं ताकि दुनियां का सबसे बड़ा लोकतंत्र बचाया जा सके ? कभी सोचा है कि कैसा लगता होगा जब दिल्ली में सोशल डिस्टेंसिंग की सख्त नियमावली लागू करके बंगाल/असम/तमिलनाडु/केरला में लाखों लोगों की भीड़ के सामने मास्क हटाकर उन्हें भाषण देना पड़ता है ? कभी कल्पना की है देश की जनता ने कि हमारे नेताओं को इसके लिए अपनी आत्मा तक गिरवी रखनी पड़ती हैं और आप हैं कि अदना से होली के लिए बेशर्म हुए जा रहे हैं ! महाराष्ट्र में लाखों केस आ चुके हैं, लेकिन हमारे राजनेता प्रदेश में लोकतांत्रिक मूल्यों को सहेजने हेतु या यूँ कहे गहराए राजनैतिक संकट में अपनी-अपनी कुर्सी के लिए मंत्रालय, राजभवन, दिल्ली और प्रेस वार्ताओं में भागे फिर रहे हैं ? कोरोना की जानलेवा दहशत को ताक पर रखकर, सरकारी गाइडलाइंस को धता बताकर भी कुर्सी की क़वायद में लगे हुए हैं। पिछले साल भी नेताओं ने मध्यप्रदेश में लोकतंत्र की गरिमा हेतु लॉकडाउन में देरी की, फिर, नेताओं ने अपने जान पर खेलकर बिहार में लोकतंत्र को बचाया और फिर आपने भी देखा ही होगा कि अभी दो दिन पूर्व भी बिहार विधानसभा में कैसे-कैसे करतब कर लोकतंत्र को शर्मसार होने से बचाया ? अभी आगे पंचायत चुनाव कराकर अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन भी करना हैं ! और, आमजन बस दो जून की रोटी के लालच और फालतू में धंधे-पानी के नाम पर यहाँ-वहाँ मारे फिर रहे हैं ? चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए एक महान देश की ऐसी नाकारा जनता को ! ये विश्वगुरू भारत की जनता को शोभा देती हैं क्या ? क्या हो जाएगा अगर कुछ दिन और स्कूल नहीं खुलेंगे तो ? क्या हो जाएगा अगर सरकारी दफ्तरों में समय पर काम नहीं होगा तो ? क्या आफत आ जाएगी अगर लोग त्योहारों पर एक-दूसरे से नहीं मिलेंगे तो ? कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा अगर इस होली पर होली-मिलन नहीं होगा या कोई बिटिया अपने मायके को नहीं जा सकेगी ? आप इन छोटी-मोटी बातों की तुलना चुनाव की महत्ता से करते हो ? जबकि इसी लोकतंत्र ने हमें विश्वगुरु बनाया हैं ? उधर देश के किसान भी बेवजह ही आफत मचाए हुए हैं ! इतने सालों से तो आप अपने खेतों से कमा ही रहे थे ना ! फिर अबतक कौन सा ताजमहल बना लिया आपने ? किसान तो तब भी फाँसी लगा-लगा कर मर रहे ही थे ना ? अब अगर सरकार आपसे ये करने को कह रही हैं तो इतनी हाय-तौबा क्यों ? 4 महीने से आकर बैठ गए हैं दिल्ली बॉर्डर पर ! तो पड़े रहो ? क्या फ़र्क पड़ता हैं नेताओं की सेहत पर ? सरकार के पास और भी काम हैं ? आखिर कब तक सिर्फ़ किसानों का रोना ही सुनती रहेगी सरकार ? सरकार चलाना और चुनाव कराना कितना जोख़िम का काम हैं ये तो वही बता सकते हैं जो कभी बैठे हो सरकार में ? आमजनों को क्या पता कि राजनीति किस चिड़िया का नाम है ? अब इस निरीह जनता को भला कैसे समझाये कि चुनाव लड़ना कोई हंसी खेल नहीं हैं ? इसके लिए उन्हें महाराष्ट्र की तरह ट्रांसफर-पोस्टिंग और उत्तर प्रदेश की तरह अमिताभ ठाकुर जैसे जबरन सेवानिवृत्ति वाला खेल भी खेलना होता हैं ? अब देश की मूर्ख-अनपढ़-बेजुबान जनता को कैसे समझाये कि यह सब लोकतंत्र की आत्मसंतुष्टि के लिए करना पड़ता है ! अरे...लोकतंत्र में कभी-कभी अपने तंत्र को मजबूत करने के लिए अपने लोक को मजबूर करना पड़ता हैं ! अब ख़बरदार...जो किसी फालतू बहाने को लेकर घर से बाहर क़दम निकले तो ? सिवाय चुनाव के....
©कुमार
