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कोरोना संकट
संकट की इस घड़ी में, चलो एक और संकट मोल लेता हूँ महामारी की इस तूफान को, तारों की तरफ मोड़ देता हूँ ।
ठहाके लगा रहे चाँद को , कटोरे में कैद कर देता हूँ मौत के उमड़ते सागर को , अपनी तलहत्थी से रोक देता हूँ
बहुत मिला है इसके जैसा प्लेग-चेचक और कैसा-कैसा मिला है जैसे को तैसा चलो उसी कतार में इसे खड़ा कर देता हूँ ।
© अमन कुमार (विक्की)
