दफ़्तर सरकारी
ये दर्द ज़रा हरजाई हैं सफर दफ़्तर सरकारी हैं ! काम का टालमटोल चरम पे फंसा इसमें सब अधिकारी हैं ?
वाकया टोकन से शुरू हुआ और, टेबल तक भरपाई हैं ! बात घंटे, दो घंटे, की नहीं ज़रूरत अदद एक चरपाई हैं ?
चाय की चुस्की में फंसा हर ग्राहक हुआ अलसाई है ! एक काम की बात हुई नही शुरू फ़ोन पर रुसवाई हैं ?
एक - दो फ़ाइल निपटाकर पेपर चार टेबल खिसकाकर ! यहाँ वहाँ लगाकर, फ्रेश हो ? अब बस खाने की तैयारी हैं !
खाने के बाद ! फिर क्या ? घंटे भर अल्प-विराम सरकारी हैं ! उस पर राजनीतिक टीका-टिप्पणी और , दुनियाँ जहान भारी हैं ?
फिर घर फोन कर यह जानना हैं कि आज क्या हैं खास खाने पर ? वैसे तो कोई काम नही हैं करने को फाइल समेट जाने की कवायद जारी हैं !
© कुमार
