ध्यान की एक सरल विधि
किसी भी एकांत स्थान पर बैठ जाएँ। कमर सीधी, गर्दन भी सीध में, दृष्टि भ्रूमध्य में। आती जाती श्वास प्रश्वास पर ध्यान दें। श्वास प्रश्वास की स्वाभाविक गति को परिवर्तित करने का प्रयास न करें। जैसे जैसे विचार आएँ उनके प्रति उदासीन रहें। विचार आए हैं तो चले भी जाएंगे आप तो मात्र अपने को देख रहे हो।
किसी भी घटना को नजरअंदाज करने का प्रयत्न न करें आप तो बह रहे हो अपनी श्वास प्रश्वास के साथ। यह बहना ही जीवन है उसे सम्मान की दृष्टि से देखें। आप की पूर्वनिर्मित धारणाएँ आपके समक्ष आती जाएंगी परंतु वे वर्तमान का परिचय नहीं हैं।, अपने को तो मात्र श्वास प्रश्वास में घुलते जाना है।
ऐसा समझें कि श्वास प्रश्वास में ही सम्पूर्ण जीवन है कल क्या होगा क्या जानें परंतु सब कुछ इसी वर्तमान में समेटें। यह वर्तमान ही प्रकाश का केंद्र है इसे न खोएँ। यदि ध्यान न लगे तो भी लगाने में निरत रहें क्योंकि आपकी कमजोरी से लड़ना जरूरी है। ऐसा समझें कि यह युद्ध है शांति का उद्विग्नता से, प्रेम का क्रूरता से, समर्पण का लोभ से।
आपको तो उत्कृष्ट को ही चुनना है। जो मन कहे उसे सुनना कोई जरूरी नहीं यह याद रखें। आप मन नहीं मन आपका है। आपका शरीर भी आपका है आप उसके दास नहीं। अपनी स्थिरता को बनाए रखें। जब आप सरल अनुभव करें, शरीर की जकड़न मिट जाए, उमंग प्रस्फुटित हो, आत्मविश्वास जाग जाए तो बाहर की दुनिया में प्रवेश हेतु तैयार हो जाएं।
आँखें खोलें तथा जीवन को नमन कर जो आपकी इच्छा है उसे करने आगे बढ़ें। ध्यान को जीते हुए अपने सभी कार्य करने में कुशल होएं। हर दिन अपने भीतर के आनंद का ही प्रकटीकरण है चाहे सुख दुख, मान अपमान के कितने भी द्वंद आ खड़े हों। आपकी शक्ति, शांति, प्रेम आप ही हो।
© सिद्धार्थ राणा
