दूसरों के दुख का अनुभव
कोई भी व्यक्ति दूसरों के दुख को तभी अनुभव करता है जब वह स्वत: उससे गुजर कुछ सीखा हो या वर्तमान में कुछ वैसा उसके साथ घटित हो रहा हो। जैसे हमारी इच्छा रसमलाई खाने की हुई। हमें लगा कि इसमें कितनी खुशी है तो क्यों न दूसरे को भी खिलाई जाए। परंतु यहां पर हमने गहराई से अपने दुख को नहीं समझा मात्र सतह पर उसे देखा। हमने अंतर्मुखी होना नहीं जाना तो सुख दुख को इन्द्रियों तक ही देखा।
यदि आत्मा के अकेलेपन पर विचार किया होता तो दूसरे के अकेलेपन को समझ उसे सांत्वना देते न कि मात्र कुछ खाने के लिए पूछते। आध्यात्म पथिक सुख में सुखी भी होते हैं तो दुख में दुखी भी। वे कुछ ओड़ते नहीं परन्तु निरंतर अपनी चेतना को अंतर्मुखी किए होते हैं। वे जानते हैं कि मृत्यु और सत्य ही अटल मार्गदर्शक हैं।
जब तक यह देह है तक तक इससे संबंधित सभी कर्तव्य निष्काम भाव से किए जाएँ न कि आसक्तिपूर्ण हो तथा सत्य को अपने व्यक्तित्व में उतारने में दृढ़ रहा जाए। कर्मयोगी यही तो करता है कि अपनी दृष्टि संसार में नहीं भगवान में लगाए रहता है तथा कर्म करता जाता है। कर्म उसकी अपनी आत्मा के मोक्ष हेतु आवश्यक है।
तमाम संसारिक झमेलों से गुजरता हुआ व्यक्ति अपने को भूल जाता है परन्तु कर्मयोगी अपने में उतरता हुआ कर्म करता जाता है। वह स्वार्थ से नहीं, भोगतृप्ति की इच्छा से नहीं प्रेम से, कर्तव्य निष्ठा से कर्म में बरतता है। अन्य लोग अपने दुख को गहराई से अनुभव नहीं करना चाहते परंतु योगी जानता है कि दुख तो उसे आगे बढ़ाने का जरिया है।
उसे जड़ता पसंद नहीं इसलिए निरंतर क्रियाशील रहता है। आलस्य, प्रमाद, लेश मात्र भी सत्पुरुषों के आचरण में प्रवेश नहीं कर पाते। वे ही दूसरों का सच्चा भला कर पाते हैं क्योंकि हमेशा साधनारत रहते हैं। वे जानते हैं कि मृत्यु की घड़ी आने तक उन्हें होश गंवाना नहीं है अपने सिद्धांतों पर अटल रहना है, निश्फिक्र हुआ सत्य के पथ पर चलना है।
दूसरे लोग न मृत्यु को स्वीकार करना चाहते हैं न जीवन को सत्य की ओर मोड़ना।
© सिद्धार्थ राणा
