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Siddharth Rana
Siddharth RanaCourseLiteraturePoetry
9 Feb 2021·1 min read·

द्वेष भाव का दुष्परिणाम

किसी एक व्यक्ति के प्रति भी द्वेष भाव हमें पूरे अस्तित्व से अलग कर देता है। क्रोध जब आता है तो उसकी दिशा मात्र अहंता की पूर्ति होती है। क्यों न इस अहंता को भगवान के चरणों में अर्पित किया जाए। परंतु कैसा भगवान? आदर्शों का भगवान जो ऊंचा जीवन जीने की प्रेरणा दे। जब हम सहते हैं तो मजबूत होते हैं ऐसा सोचें तथा विरोध सही प्रकार करते हैं जहां पर व्यक्ति नहीं बुराई दोष है तो अपनी ऊर्जा को सार्थक दिशा दे पाते हैं।

इस संसार में कई ऐसे व्यक्ति मिलेंगे जो तुम्हें छिन्न भिन्न करने का प्रयास करेंगे, तुम उन्हें गाली दोगे, कुंठित होगे। ऐसे में एकत्व की दृष्टि छिन जाती है। वह जो समभाव योगी का गुण होता है वह नहीं रह जाता। क्यों न प्रत्येक अवांछनीयता को अवसर में बदल लिया जाए। क्यों न मन में उठ रहे उद्वेग के विचारों को सही रास्ते से गुजरने दिया जाए।

विचार बड़ी शक्ति हैं क्योंकि वह किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं होते। हमारा मन ब्रह्मांडीय ऊर्जा से क्रियाशील है। एक स्वास आ रही है तो दूसरी हम दे भी रहे हैं। याद रखें कि दुनिया को विकृति का विचार नहीं चाहिए। शांति, सद् भावना, समरसता का वातावरण बनाने के लिए हमें अपने विचारों को कसना पढ़ेगा।

सही नहीं सोच सकते तो बुरा भी नहीं सोचें। अपने आप से ऊपर उठे रहें। कमल की भांति खिलें। जो कीचड़ व जल में समान ही खिलता है। पूरे अस्तित्व का मित्र बनने के लिए कुछ कसौटियां तो कसनी पड़ेंगी। कुछ तो बदलाव लाना होगा। कोई हमें नहीं गिराता हम ही खुद को गिरा देते हैं। गीता कहती है कि आत्मा स्वयं अपने उत्थान एवं पतन का कारण है।

दूसरों के दोष याद रखना भी छोड़ दो। अपने दिख सके तो सुधार दो। खुशी से एक बार फिर भगवान की सुंदर सी दुनिया को गले लगा लिया जाए।

© सिद्धार्थ राणा