एक फोन की घंटी
एक फोन की घंटी, मायूस चेहरों पर मुस्कान लाती हैं । दो बिछडे दिलों को मिलाती है । जन -जन के बीच की दूरियाँ मिटाती है । पास को दूर, दूर को पास बुलाती है । जब अपनों की याद आती है तब फोन की घंटी बज जाती हैं । हर कठिनाइयों को सहज बनाती है । अपराधियों को भी सलाखों के पीछे पहुँचा देती है । उमंग, उत्साह की नई दुनिया बसाती है । एक फोन की घंटी, सुख चैन भूला देती है । रिश्तों में कभी न बुझने वाली, आग लगा देती हैं । सुकून के नींद सोने वाले को भी, तबाही मय्सर करा देती है । जिन्दगी के खुशियों के महल को, एक झटके में गिरा देती है । जो बातें दबाये रखनी थी सिने में, उसे भी जन संचार का साधन बना देती है । एक फोन की घंटी पूरी रात जगा देती है । रिश्तों में कई संदेहास्पद विशाल बृक्ष लगा देती है । सूक्ष्म बातों को भी बिशालकाय बना बता देती है । पूरे जीवन जिनका मुखमंडल धूमिल न हुआ, उनके आँखों में भी तबाही की आँसू ला देती है । रोगों से जिनका कभी पाला न पड़ा ,उन्हें भी अस्पताल दिखा देती है । एक फोन की घंटी ही है जनाब, जो मौत को भी पास बुला देती है । सुख, चैन, नींद सभी कुछ काल के भेंट चढ़ा देती है । लाचारी, बेबसीऔर उदासी के समन्दर में डूबा देती है । बूझी हुई चिन्गारी को भी हवा दे, ताण्डव नृत्य करा देती है । एक फोन की घंटी है जो हमें से कोशों दूर पहुँचा देती है । घटित हो कुछ और, कुछ और समझा देती है ।
©सतीश कुमार पांडेय
