गाँव, शहर और प्रकृति
प्रकृति से हमारा नाता कितना टूट चुका है। अपने पहाड़ी गांव की सैर करते हुए जो बात मन को विचारने पर मजबूर करती है कि शहरों का जीवन जीवनरस से कितना दूर है। अपने बौद्धिक कौशल से अच्छे पदों को प्राप्त कर बंगला, गाड़ी, अच्छे वस्त्र, ढ़ेढ़ सारे उपकरण संग्रह कर मानव शहरी होने में गौरव अनुभव करता है।
परंतु गांव जाने पर वहां सादा आहार-विहार, वहां के लोगों का सरल व्यवहार, अपने पुरखों एवं प्रकृति से प्राप्त प्रेरणाओं का अनुसरण सभी कुछ काफी उच्च प्रतीत होता है। भले ही ग्रामीण संस्कृति में उस ऋषियुग के दर्शन न होते हों जहां प्रकृति के सौंदर्य में चारों ओर ईश्वर की झांकी देखी गई तथा अंधविश्वास, कुरीतियां, जड़त्व वहां देखा जाए फिर भी शहरों की तुलना में गांव ही हमें अपनी जड़ों से जोड़ते हैं।
शहरों की गलियों से गुजरते हुए हम अनजान हैं, भीड़ में भटकते मुसाफिर हैं, चाहकर भी गंदगी, गरीबी, बेरोजगारी, अपराध, बीमारी जैसे विघ्नों को हटाने में लाचार हैं। अपने गांव का पिछड़ापन भी शहरी जीवन की विकृतियों के समक्ष भाता है। वास्तव में जीवन एक ही है जो इस क्षण घटित हो रहा है।
जीवन को एक लंबे समय की संज्ञा दी गई है जिसमें मनुष्य को अपनी इच्छाओं की पूर्ति करनी होती है परन्तु वह परिभाषा आत्मानुकूल नहीं प्रतीत होती। गांव अपनी आत्मा से जुड़ने का अवसर देते हैं तथा यह बताते हैं कि क्यों ' आत्मभूतेषु सर्वेषु ',' वसुधैव कुटुम्बकम् ',' स्वर्गयादपि गरिष्यसि ' जैसे महावाक्य दिये गए।
© सिद्धार्थ राणा
