← PrevNext →
Mithilesh Kumar
Mithilesh KumarCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·1 min read·

गुमनामी

बैठा एक गुमनामी में, लगता चारो ओर अंधियाली है। ढूंढ़ता जीवन का एक कोना, वो भी तो सब खली है। हम बैठे प्रतिस्पर्धा के इस दौर में, भ्रूण अर्पण से करते भागादौड़ी।

भाग तू, भाग तू, जिदंगी की दौर में कहीं छूट ना जाए पिछे। लगाओ दौर, चूम ले सितारे, बन जाए सिरमौर सभी पर। सीख हमे यही मिलती, सब इस दुनियादारी से।

जिंदगी चलती जाती, उसका तो अपना नियम है, साथ ही लेखा जोखा। इससे कब क्या होने वाला, दौड़ लगाते देखा देखी। ऐसी दौड़ कभी खत्म ना होने वाली, फिर क्यो हम दौड़ रहे?

जिंदगी कहां छूटने वाली, इस दौड़ की भागादौड़ी से। कोई ना इससे से बच सकता, जीवन के खीचे खाकें से। पर करने से रोका किसने, संयुक्ति कर इस ब्रह्माण्ड से।

बन जाए एक कायाकल्प वृक्ष भांति, सभी मन, भावनाएं, ऊर्जाएं सभी हो जाए एक सिद्ध में। सृष्टि के स्रोत ही, हमारा मार्गदर्शन करे।

भागे झूठी दुनियादारी के भागदौड़ से, जीवन का लक्ष्य निर्धारित करे। लग जाए इसमें पूरी सिद्वत से, एकाग्रता से, जीवन दर्शन हो जाए।

उद्देश्य हमारा ऐसा हो, हम भी खुश रहे, चारो ओर खुशहाली हो। बनाए जीवन स्वास्थय, शांतीपूर्ण, ममतामय एवम् करुणामय, आनंदित, सभी और ऐसा उजियारी हो।

बैठा एक गुमनामी में, लगता चारो ओर अंधियाली है। ढूंढ़ता जीवन का एक कोना, वो भी तो सब खली है। हम बैठे प्रतिस्पर्धा के इस दौर में, भ्रूण अर्पण से करते भागादौड़ी।

#गुमनामी

©#मिथिलेश कुमार