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Amrita Singh
Amrita SinghCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·1 min read·

हकीकत

बचपन के खेल, बचपन की यादें, माँ से जिद्द, पिता से फरियादें,

याद तो है सब पर अपनी नहीं लगती अब ये कहानी,

जब से विदाई के साथ दहलीज है लांघी, मिटने लगी कई निशानी,

अपना कमरा, अपने खिलौने और सभी ठिकाने, सारा घर मुझे पहचाने पर आइना भी लगे बरगलाने,

कल हीं किया था तुने चौखट पार, क्यूँ अब आई हक जताने , सामान पड़ा है तेरा बैठक में, हकीकत फिर भी तू न पहचाने,

देख खड़ी है दीवार बैठक और कमरे के बीच, उस पार तू है इस पार सिर्फ सच।

©#अमृता