Mithilesh Kumar
Mithilesh KumarCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·1 min read·1·

हरियाली

चला जा रहा था, सामने एक विशाल हरियाली सी छाई। जैसे जैसे पास जा रहा, लगता दूर जाती वो विशाल पुंज। बादल का डेरा ऐसा, लगता अब बरख पड़ेगी। किंचित भाव, देखता उस दौड़ती विशाल पुंज को।

चार पैरों वाले बिजली के खंबे, थामे विकास की डोर। और भी विशाल प्रतीत होता हुआ, आगे बढ़ता हुआ। बादल का डेरा ऐसा, लगता अब बरख पड़ेगी। किंचित भाव, देखता उस दौड़ती विशाल पुंज को।

चला जा रहा था, सामने एक विशाल हरियाली सी छाई। जैसे जैसे पास जा रहा, लगता दूर जाती वो विशाल पुंज। वेग ऐसी की, चिर दू सीना। रुई की चादर ओढ़े प्रकृति, मदमस्त चलता जा रहा।

मानव की बस यही गति, प्रभुत्व कायम कर इस प्रकृति पर। बस भूल ये हमारी, भ्रम को तोड़े। भ्रांति ना पाल तू, ये ना है कभी संभव।

प्रकृति ही अपनी जननी, बैठा सामंजस्य तू। शमा जा उनके सीने, एकसाथ हो। लग जा गले, इन हरियाली भारी विशाल पुंज में। चला जा रहा था, सामने एक विशाल हरियाली सी छाई।

#nature

©#मिथिलेश कुमार