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हे मानव
धरती को कुटुंब मानने वाले हे मानव अब सुखे कुँए में, क्या टटोल रहे हो ?
जल ही तो चाहिए फिर रेत को, क्यों नोंच रहे हो ? बताओ ?
अब कौन सी धारा मोड़ रहे हो? नए युग मे जीने वाले कुदरत की सीना चीरने वाले घाटियों में क्या ढूंढ रहे हो ?
संजीविनी तो चाहिए पर पहाड़ तोड़ रहे हो। अंतरिक्ष की सैर में निकले हो, पर्वतों पर क्या भूल गए हो ?
छाया चाहिए और लकड़ी काट रहे हो धरती को कुटुंब मानने वाले हे मानव सूखे कुऍं में, अब क्या टटोल रहे हो ?
©अमन कुमार (विक्की)
