जीवन एक नाटक है
जीवन एक नाटक है रूप अपना पर हम बदलते रहते यही तो सच्चाई है जिसे स्वीकार नहीं हम करते
कल जो हुआ वह आज से संबद्ध नहीं आज एक नया अभिनेता जाग उठा कल दूसरा जागे क्या पता पर तलाश उसे है मात्र अपनी कोई निष्कर्ष नहीं है यह चाह क्योंकि सब कुछ ओढ़ ही तो रखा
इस नाटक में एक सच्चाई है दूरी का न बखान कर कि पास सदा उसके हम यह हमने स्वीकार करा वह भेद बुद्धि से नहीं जाना जाता पर घुल जाने पर जीवन से एक त्योहार सा नजर आता यह चादर लौटानी है एक दिन क्यों न इस पर नाम लिख दें उस कलाकार का जो एक से अनेक हो गया
सूर्य , चंद्रमा , नदी, बादल, पेड़ सब उसीके रूप ही तो हैं हम भी एक अंश में वही सौंदर्य ही तो हैं दूरी अपने मन में बना फासला बाहर तय करने निकलते पर जीवन को एक त्योहार बनाना हम भूल क्यों जाते
संदेश यदि पूछो प्रकृति का तो यही कि फूल बन खिल उठो कांटे तो स्वाभाविक हैं पर कांटों से अपने को न भूल जाओ तुम्हें खिलना है मात्र रंग रूप में सभी भिन्न परंतु हैं कृति एक ही कलाकार की सुख दुख के द्वंदों में आनंद मिलता जब समझें कि यह हम नहीं यह हमारे चेहरे
जीवन एक नाटक है रूप अपना पर हम बदलते रहते यही तो सच्चाई है जिसे स्वीकार नहीं हम करते
© सिद्धार्थ राणा
