जीवन के लक्ष्य
हमें बचपन से जीवन के लक्ष्य के बारे में कुछ भी नहीं बताया गया है। यही लगता रहा कि जीवन छोटी खुशी से बड़ी खुशी की यात्रा है, नए नए अनुभवों को समेटने का पर्व है, ज्ञान की खोज है। परंतु यह बातें भी रटी रटाई ही थीं। इनमें कुछ ऐसा न था जो अपना कहा जा सके। जब किसी बुजुर्ग का देहांत होता था तो कहा जाता चलो बढ़िया हुआ मुक्ति मिल गई काफी पीड़ा में थे।
पर फिर लगता कि क्या जीवन यही है जहां मनुष्य कभी किसी एक सच्चे प्रेम, शांति, सुख के श्रोत तक न पहुंचता हो तथा जिसमें मनुष्य जवानी में जीवन की तलाश करता हो तो बुढ़ापे में उससे मुक्ति चाहता हो। यह बात उस व्यक्ति से मिलती जुलती है जो नौकरी तो कर रहा था पर ऊब चुका था तथा जब काम ढंग से न करने पर उसे बाहर निकाल दिया गया तो वह कहने लगा चलो छुटकारा मिला ऐसी नौकरी से। अब यही लगता है कि धर्म को लोगों ने पाचन की दवाई समझ लिया है।
जब जीवन में कुछ पचे नहीं तो स्वर्ग याद आ जाता है, मुक्ति याद आ जाती है और भी पता नहीं क्या क्या। यदि पहले से साधना न की जाए तो जिसे शास्त्रों ने परमपद कहा है वह इस जन्म में संभव नहीं लगता। उस परमपद को भी कुछ ऐसा समझ लिया गया है कि अधिकांश लोग उससे डरने लगते हैं। युवा भगवान की बात से दूर भागने लगेंगे, उनसे बड़े लोग काम का बहाना ढूंढ लेंगे तो बूढ़े मुक्ति की बात करेंगे। यह कैसी विचारधारा है जो भारतीय मानस में अपनी जड़ जमा गई है।
मुक्ति छूट जाना नहीं वह तो अपने से मिल जाना है। अपने से मिल जाने के लिए सच्चाई को स्वीकार करना पड़ता है जो कोई विरले ही करते दिखते हैं। शेष तो सच्चाई को झूठ करार देते हैं। हमें ही निश्चय करना होगा कि हमें किस प्रकार आध्यात्म पथ पर आगे बढ़ना है या कहें कि अपने में घुलते हुए संसार में विचरण करना है।
महात्मा गांधी कहते थे ' मैं अपनी मुक्ति तथा भारत की मुक्ति को एक ही मानता हूं '। ऐसा इसलिए क्योंकि उन्होंने जन सेवा में ही आत्मकल्याण को देखा था। रबिंद्रनाथ टैगोर भी कहते थे ' समाज से दूर कोई मुक्ति है तो वह मेरी नहीं '। मुक्ति भारतीय संस्कृति का मूल है तथा इसे सही समझना हमारे लिए जरूरी है। यह चेतना का विस्तार है न कि हमारे मन की कपोल कल्पनाएं।
© सिद्धार्थ राणा
