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Rahul Devashish
Rahul DevashishCourseLiteraturePoetry
22 May 2021·1 min read·

जूझता है जब कभी मन

निडर होकर जब मन सोचता है, जीतने की ख्वाब देखता है सौ मुश्किलें आ सामने से, बार-बार रोकता है।

जूझता है जब कभी मन अंतर्द्व्न्द की आँन्धियों से, टूटते विश्वास को, बेरहमी से झकझोरता है।

परेशानियों से आहत होकर रगों की लहू जब ठहरती है, शांत मन की चिंगारियाँ भड़क उठने को मसोसता है।

© राहुल देवाशीष