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कबतक
कब हम जनता आम बनेंगें, एक दूजे का सम्मान बनेंगें !
देश हमारी दुविधा में हैं , कब उसके संतान बनेंगें ?
हर डगर चौबारों पर हम कब तक झूठी स्वांग बनेंगें ?
यूँ ही राम नाम अवतार छलेंगे कब तक मजमा साद बनेंगें ?
तम के विकल समरक्षेत्र में कब ज्योत्स्ना तेज बनेंगें ?
©#कुमार
