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Rahul Devashish
Rahul DevashishCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·2 min read·

कर्त्तव्य और निर्भरता

जिन्दगी शब्दों का संग्रह है। ऐसा संग्रह जिसमें एक ही शब्द के कई अर्थ निकल कर आते हैं। हर आदमी इन शब्दों को अलग-अलग अर्थ प्रदान करता है। यहाँ तक कि अपने जीवनकाल में हरेक व्यक्ति अलग-अलग उम्र में एक ही शब्द को अलग-अलग अर्थ देता है। <!--more-- कर्त्तव्य (Duty) और निर्भरता (Dependency) ऐसे ही दो शब्द है जिनकी बातें हम इस लेख में कर रहे है। कर्त्तव्य का अर्थ है- अपने ऊपर की जिम्मेवारियों को निभाना।निर्भरता का अर्थ है -अपने ऊपर आश्रितों का भरण-पोषण करना। भारत में 14 वर्ष से कम उम्र तथा 65 से अधिक उम्र की जनसंख्या, महिलायें, बीमार , आदि निर्भर जनसमूह है। भारत की निर्भर जनसंख्या लगभग आधी है। इन आश्रितों को पालनेवाला कर्त्तव्य निष्ठ है।

अपने ऊपर निर्भर लोगों को उनके जरूरत की चीजों को जुटाकर देना कर्तव्यनिष्ठों का कर्त्तव्य है। लेकिन इन निर्भर में से उन लोगों को भी अपने ऊपर निर्भर बनाये रखना जो आत्मनिर्भर हो सकते है यह हमारी ड्यूटी नहीं होनी चाहिए।अपने ऊपर निर्भर लोगों में अगर संभावनाएं है ,उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की तो इन संभावनाओं को तलाशना और तराशना भी हमारा कर्त्तव्य है।

अपने ऊपर अधिक व्यक्तियों को निर्भर बनाने से हमारी भौतिक एवं आध्यात्मिक प्रगति बाधित होती है। अधिक निर्भर व्यक्ति के रहने से पारिवारिक जिम्मेवारियाँ बढ़ जाती है। इन जिम्मेवारियों को पूरा करने के लिए अधिक श्रम करना पड़ता है। अधिक श्रम करने से व्यक्तिगत जीवन के लिए समय नहीं मिल पता है। व्यक्तिगत जीवन को समय नहीं दे सकने के कारण व्यक्ति परेशान रहने लगता है। व्यक्ति तनाव में रहता है।

इस परेशानी और तनाव भरे जीवन को जीने के लिए वह नशा या गलत आदतों का सहारा लेता है। नशा और गलत आदतों के सेवन से उनकी कार्य क्षमता घट जाती है। व्यक्ति बीमार रहने लगता है। बीमार व्यक्ति अपने परिवार पर आश्रित बन जाता है। इस प्रकार एक आश्रय प्रदाता, खुद ही आश्रित बन जाता है।

<strongनिष्कर्ष </strong समाज में निर्भर व्यक्तियों की जनंख्या बढ़ती जा रही है। उन सब की जिम्मेवारी लेना न ही संभव है और न ही जायज। निर्भर को आत्मनिर्भर बनाना हमारा कर्त्तव्य होना चाहिए।