कर्तव्य पथ
कर्तव्य के पथ पर अड़ा योजन दूर खड़ा हूं नील गगन के एक कोने से न जाने किस-किस से लड़ा हूं ।
मेघों को मात देता हूं पर अंधियारों से टूट जाता हूं।
फिर भी भिनभिनाती काली रातों को चित कर उजियारे का परचम लहराता हूं ।
हर बार गिरता हूं गिर कर संभलता हूं खून से सने इस लथपथ पथ पर खड़ा हूं।
©अमन कुमार (विक्की)
