खुद को पुकार तू
खुद से ही खुद को ललकार तू,स्वयं से जंग जीत के, जिन्दगी निखार तू। सोये पड़े साहसों के चट्टान तेरे सीने में,बस एक दफा पुकार तू। वेदना के महल सभी भस्मसात कर,बनकर अँगार तू। हो जायेगें जमींदोज बाधा- विघ्नों के पर्वत सभी, बस एक बार हूँकार तू। जकड़े है पाँव में बेड़ियाँ जो, उससे मुक्त होने को युद्ध कर आर-पार तू। खुद से ही खुद को ललकार तू,स्वयं से जंग जीत के, जिन्दगी निखार तू। सामर्थ्य स्वयं से ,स्वयं का जान तू,प्रत्यंचा स्वयं के पाप पर अब तान तू। मान-अपमान नहीं जगत् में, खुद ही अपमान तू,खुद सम्मान तू। न मुहँ मोड़ यूँ संघर्षो की भट्टी से,आने वाले वक्त का बन जा मान तू, स्वाभिमान तू। समय के सरगम से हाथ मिला, बन जा कलकल करती नदियों के गान तू। एक लक्ष्य साध के, अब छोड़ अपनी कमान तू। खुद से ही खुद को ललकार तू,स्वयं से जंग जीत के, जिन्दगी निखार तू। तेरा रथ न कोई रोक सके, अपने हाथों बागडोर इस कदर थाम तू। शौर्य, समर्पण, साहस से सिंच, वक्त बदलने की परिपाटी में अपना अमर कर नाम तू। स्वर्णिम दास्तान अंकित हो जाए ,ऐसा अद्भुत कर जा काम तू। छोड़ के परवाह जमाने का, अपने ही भुजदंडों पर जगमग कर दे धराधाम तू। भूला दो निन्द-चैन सभी, मंजिल फतह के पहले कभी न कर आराम तू। खुद से ही खुद को ललकार तू,स्वयं से जंग जीत के, जिन्दगी निखार तू।
© सतीश कुमार पाण्डेय
