खुला बदन
मैला सा तन मेरा खुला बदन मेरा इन छोटी-छोटी आंखो से उदासी भरी पड़ोसों से, डगमगाती विकास की पहिया इस पर कुशासन की पहरेदारी और हिंसक रूपी पहिया कुपोषण का मुहर लगाकर ढेरों बीमारियों को आमंत्रित कर लाता है, इसी बीच पंख फैलती अशिक्षा अंधविश्वास का राजतिलक कर जाता है।
©अमन कुमार (विक्की)
