खुश मानव
यह बात विस्मय पैदा करती है कि इतनी तरक्की के बाद भी मानव खुश नहीं है। हजारों सालों से हमने क्या सीखा है जो दो विश्वयुद्ध, आतंकवाद का बढ़ता प्रकोप, नई नई बीमारियों की उपज को रोकने में भी हम असमर्थ हुए। वह क्या है जो हमने नजरअंदाज कर दिया। हर मनुष्य अपने जीवन को सुखी समुन्नत ही बनाना चाहता है।
फिर क्यों ऐसी कुबुद्धि उसके मन में प्रवेश कर जाती है कि किस प्रकार इतनी सुंदर प्रकृति पर व्यक्तिगत स्वार्थ हेतु आधिपत्य जमाया जाए। जो हमारे घरों में होता है वही दुनिया में एक बड़े स्तर पर। उदाहरण के लिए ईरान की प्रसिद्ध महिला क्रांतिकारी नसरीन सौतोदेह जिन्होंने हिजाब के विरुद्ध आवाज उठाई तो 38 वर्ष की कैद सुना दी गई।
उससे पहले भी महिला उत्पीड़न एवं बाल सुरक्षा के मामले में पत्रकारिता तथा कानून का सहारा लिया, अपनी आवाज बुलंद की, लोगों को जागरुक किया तो वहां की सरकार ने उन्हें जेल में दाल उत्पीड़ित किया। अक्सर जिन लोगों के पास शक्ति अधिक होती है वे उसे मानवता को दबाने में लगाते हैं।
57 वर्षीय यह महिला सरकार, धर्म, मानवाधिकार के बीच की खाई को दर्शाती है जो ईरान जैसे कई देशों में दिखती है। पोषण भावनाओं को नहीं मिलता नफरत, अत्याचार, आधिपत्य को मिलता है। अमेरिका के डोनाल्ड ट्रंप इसका उदाहरण हैं जो जाते जाते हिंसा भड़का गए। यदि उनकी जगह हिलरी क्लिंटन राष्ट्रपति बनी होती तो अमेरिका विश्व शांति एवं समरसता के पथ पर अडिग रहता।
ज्यादा दूर जाने की आवश्यकता नहीं है अपने आप को, परिवार को, रिश्तेदारी को देख भी एक युद्ध की स्तिथि नजर आती है जो भले ही हथियारों वाला नहीं परन्तु वैचारिक भिन्नता को दर्शाता है। मनुष्य जीवन इतना महान एवं अमूल्य है। यह संसार को एकत्र करने का अवसर समझा जाए या विवेक वैराग्य से एकत्व की ओर बढ़ने का सुयोग, जो भी समझा जाए परन्तु मूल में तो सुख, शांति, प्रेम ही होना चाहिए था।
परंतु भौतिक जीवन एवं आत्मिक जीवन में संतुलन न स्थापित करना हमारी आदत हो गई है। आज जो अपने कहे जाते हैं वे भी अपने नहीं क्योंकि अपने में ही उलझे हैं। हर मनुष्य यह प्रतिज्ञा करता कि वह खुद को सुधारेगा, जगती के कल्याण हेतु अपना श्रम, मनोयोग, धन, समय लगाएगा तथा एक श्रेष्ठ जीवन का अधिकारी कहलाएगा तो यह धरती को स्वर्ग बना देता।
पर कौन किसको समझाए, अभी के लिए तो यही उपयुक्त है कि अपने आप को साधते रहा जाए। अपने भारत देश के आध्यात्मिक उत्थान हेतु यही सबसे बड़ी सेवा है क्योंकि भारत मात्र देश नहीं आत्मा का प्रतीक है। एक दिन वह अवश्य आएगा जब ऋषियों का संदेश इस भारतभूमि से चहूं ओर फैलेगा तथा यह धरा खिल उठेगी।
© सिद्धार्थ राणा
