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कुछ ऐसा हर रोज करें
दधीचि सा अस्थि खोज करो और, ऐसा तुम हर रोज करो !
स्वयं के ही साधक तुम ठहरे मत दो उड़ने पर तुम पहरे । पंखों पर ना सिर्फ परवाज़ करो हौसलों पर तुम नाज़ करो ! <!--more-- खुद जला प्रज्वलित ओज करो और, ऐसा तुम हर रोज करो ।
आज गगन में जो तुम लहरे दाग लगेंगे सच में गहरे । अपवादी का अपवाद करो फिर खुद से ही संवाद करो ! खुद में खुद का सोज़ करो और, ऐसा तुम हर रोज करो।
धुंध को न बनने देना कोहरा गाना तुम हर दिन ही सोहर। खुद में ही वरदान भरो ऐसा कुछ अपना मान करो ! खुद से खुद को राजा भोज करो और, ऐसा तुम हर रोज करो ।
दधीचि सा अस्थि खोज करो और, ऐसा तुम हर रोज करो !
©#कुमार
