Kumar Bhupesh
Kumar BhupeshCourseLiteraturePoetry
4 Aug 2021·1 min read·

लालकिला और आश्वासन

लाल किले को दिया आपने सिर्फ ईंट-गारो का मान, पर, हमारे लिए तो वो हैं आज भी पूरा हिदुस्तान !

आज तक न खरे उतरे खुद पे कृपानिधान, कैसे करें तब आमजन आपकी बातों का सम्मान !

पिछले बरस ही तो भेजी थी हमारे गांव को एक अदद नहर, वो तो आपके वादों सा ही ढाह रहे हमपे नित नए कहर !

और, इस साल फिर आपने भेज दी इक नदी, भला कैसे नहीं डूबेंगे इसमें हमारे गांव - शहर !

जब मिली नदी-नहर से तो दोनों ही रो पड़े, बोले की लाल किले अब कैसे-कैसे शौक फरमाएंगे !

पहले प्यासी जनता को नदी-नहर में भेद समझाएंगे, फिर, बहाकर उल्टी धारा हमें सालों तक भरमाएंगे !

अब गांव वाले कैसे भला दोनों का बोझ उठाएंगे, सरकारी कर्ज़ों की जीवटता तो ये तनिक न सह पाएंगे !

भला अब कौन हमारे प्यास बुझाने आएंगे, 74 वर्षों से प्यासे गांववाले प्यासे ही मर जाएंगे !

©कुमार