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Satish Kumar Pandey
Satish Kumar PandeyCourseLiteraturePoetry
8 May 2021·1 min read·

मन अब धीर धरो

मन कुछ धीर धरो । स्वयं को न व्यथित करो । भ्रम के उपवन में मत विचरो । खुद को न कभी गमगीन करो ।

हर क्षण हो प्रफुल्लित, वो ज्ञान नवीन भरो। उपेक्षा, उपहास के दर पर न शिश धरो । हर प्रभात के संग नव उमंग भरो। द्वेषता के बंधन को भस्मसात करो।

धरा से अंबर तक हो गुंजित, वो स्वर बुलंद करो। भूल के वेदना स्वयं का, औरों का संताप हरो । दूजे के आरोपों से खुदको बेफिक्र करों । जीवन है अनमोल, इसका व्यर्थ न क्षरण करों ।

स्वयं से स्वयं के दुर्भावनाओं का हरण करों । द्वेषता, मलिनता, कलुषिता का अब न अनुसरण करों । उन्मुक्त गगन में सूर्य, चन्द्र, तारों सा विचरण करों । नई उमंग भरो, नई क्रांति करो।

फरियादी बन ,अब न दर- दर विचरो। नवोन्मेष के प्रकाश से खुद को सराबोर करो । हे !मन अब वसुधा सा धीर धरो । खुद को न दूजे के भावों पर समर्पित करों । प्रसन्नता, उल्लास का सृजन कर, जगत् को आश्चर्यचकित करो ।

©सतीश कुमार पांडेय