← PrevNext →
Mithilesh Kumar
Mithilesh KumarCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·1 min read·

मंदिर

मै खड़ा था बिल्कुल अकेला, पास थी एक मंदिर हनुमान की।पहुंच गया मैं आशीर्वाद लेने, पुजारी ने मुझे टीका लगाया, प्रसाद भी दिए।जैसे ही प्रसाद मेरे हाथ में मिली, एक बच्चा आया, प्रसाद मांगने लगा।मैंने आधा लड्डू तोड़ के उसे दे दिया, लेकिन मै सोच रहा था।बच्चा मुझसे क्यों प्रसाद मांग रहा था, वो तो पुजारी से ले लेता।

बच्चो का मन भी कितना कोमल होता है, नादान भी। बस कहीं उसे डर था कि पंडित जी प्रसाद देंगे कि नहीं। जब मुझे दे दिया, उसे भी मिलती ही। बात है समय पर मांगते कौन है। ईश्वर तो देने लिए खड़े होते है।

यही बात लागू होती, ब्रह्मांड की सारी शक्तियां है, फैली, बस चाहिए हमारे पास टेक्नोलॉजी हो, उससे जुड़ने की। थोड़ा हिम्मत भी होनी चाहिए। हम सभी उस महान शक्ति के बच्चे समान ही है। जैसे उस बच्चे ने हमसे मांगी थी।

जीवन में कभी कभी हम हिम्मत जुटा नहीं पाते, लेकिन डर के आगे जीत है। हमे बिल्कुल मन ही मन हंसी आ रही थी, बच्चा तो बस बच्चे होते है। मै तो भिखारी बन ईश्वर से आशीर्वाद लेने चला गया था।मुझे क्या पता, हम भी किसी के भगवान जैसे है।

ईश्वर हम सब में है, पहचान की आवश्यकता है।ऐसे ही हंस कर मै चल पड़ा। फिर अकेला हूं, लिख रहा हूं फ़ेसबुक डायरी।

#chhotikahaniya

©#मिथिलेश कुमार