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Satish Kumar Pandey
Satish Kumar PandeyCourseLiteraturePoetry
11 Jan 2022·1 min read·

मेरी मातृभाषा

सूर्य सा दैदिप्यमान हो रही यह भाषा। कलुष कल्मस को धो रही यह भाषा। नव सृजन को ,प्रस्फुटित हो रही नई जिज्ञासा। जन-जन में संस्कृति संजोने की प्रबल कर रही अभिलाषा। गाँव के खलिहान से, शहर के मकान तक की भाषा। सागर के गहराई से, अंबर के ऊँचाई तक की भाषा। फूलों के महक से ,पंक्षियों के चहक तक की भाषा। वीणा के तान से,कोयल की मधुर गान तक की भाषा। दीन दुखियों के धमनियों में संचारित करती नई आशा। मनुजता के अर्जन से, दिनकर के गर्जन तक की भाषा। क्षण क्षण नई दास्तान गढ़ रही है। अब सहारे की जरूरत नही इसे, अब ये स्वयं परवान चढ़ रही है। रश्मियों सी तेजपूंज लिए ये निसदिन बढ़ रही है। इसे अब सहारे की जरूरत नहीं। इस जहां में इस सा कोई खूबसूरत नहीं। चकाचौंध से बदल जाए, इसकी ऐसी मूरत नहीं। मैं खुश हूँ, मेरे साथ मेरी मातृभाषा है अब किसी और से मिलने की फूर्सत नहीं।

आप सभी को राष्ट्रकवि दिनकर के हूँकार, अटल जी के ललकार,सुभद्रा कुमारी चौहान के तलवार की भाषा अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ एवं बधाई। आइये हम सभी मिलकर इसे राष्ट्रभाषा के रूप स्वीकार करने और दूसरों को कराने का दृढ़संकल्प ले।

© सतीश कुमार पाण्डेय