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Siddharth Rana
Siddharth RanaCourseLiteraturePoetry
9 Feb 2021·2 min read·

मूर्तिपूजा के पीछे का रहस्य

मूर्तिपूजा के पीछे का रहस्य क्या है। जब भगवान कृष्ण युद्धभूमि में अर्जुन को उपदेश दे रहे थे तो परमात्मा का एक ही नाम 'ओऊम्' तथा एक ही मंदिर हृदय को बताया। फिर जिस मूर्तिपूजा को घर घर स्थान मिला हुआ है उसका क्या कारण है। यह साकार उपासना का विषय है। निराकार पर ध्यान लगाना कठिन है परंतु साकार पर सरल है।

साकार उपासना में अपने ईष्ट के चित्र, मूर्ति या किसी अन्य प्रतीक पर इस प्रकार ध्यान लगाया जाता है कि जो कुछ उससे प्रदर्शित हो रहा है उसे हम धारण करें। जैसे गायत्री माता का चित्र है। उसमें वे एक कन्या हैं जो हँस पर विराजमान हैं। हँस साधारण नहीं राजहँस है जिसकी प्रकृति कीड़े खाने की नहीं परंतु दूध ग्रहण करने की है।

उसकी ऑंखों का चित्रण कुछ इसी प्रकार है कि उसके विवेकी होने का परिचय मिले। ऐसे हँस पर माँ सवार हैं जो सही गलत का भेद जानता है। हँस के ऊपर कमल आसन पर वे बैठी हैं। कमल कीचड़ हो या शुद्ध जल कहीं भी खिल सकता है। यह संसार विवेक की दृष्टि से देखा जाए तो कीचड़ भी है तथा शुद्ध जल भी।

हर परिस्थिति में इससे ऊपर उठे रहना ही कमल की भांति खिलना है। माँ के एक हाथ में वेद हैं तो दूसरे में कमंडल। वेद जीवन के आत्मिक पक्ष को तो कमंडल भौतिक पक्ष को दर्शाता है। वे ज्ञानदात्री भी हैं तो पालक पोषक भी। एक कन्या को माँ का स्थान देना अपनी संस्कृति में ही संभव है। यह बात यह दर्शाती है कि भगवान जन्म मृत्यु से परे हैं।

वे निर्लिप्त, सम, शांत हैं। इस बात को योगीजन गहरे ध्यान में अनुभव करते हैं परंतु ज्यादातर लोग जो अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए धन, यश, संपदा की ईच्छा के साथ आध्यात्मिक प्रगति के इच्छुक हैं उनके लिए ब्रह्म का साकार रूप माँ गायत्री के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है। जो हमारे अनुभव में नहीं, या तो उस पर कल्पनाओं की रचना की जाए तथा भ्रमित होया जाए या एक देवी देवता के रूप में उसे स्वीकार किया जाए।

उपासना का अर्थ है अपने आराध्य के पास बैठना। जो निराकार उपासना करते हैं उन्हें अधिक विवेक वैराग्य की आवश्यकता होती है। परंतु साकार उपासना ज्ञान नहीं भक्ति प्रधान है।

© सिद्धार्थ राणा