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Satish Kumar Pandey
Satish Kumar PandeyCourseLiteraturePoetry
8 Mar 2021·2 min read·

नारी शक्ति

कभी आदिशक्ति बन धरा के कलंक मिटाती है । कभी अनशूया बन सृष्टि नियम को चुनौती दे जाती है । कभी सीता बन दशानन मृत्यु की आधार बन जाती है । कभी द्रोपति बन कौरवों के सर्वनाश का कारण बन जाती है । कभी गंधारी बन त्याग का पाठ पढाती है । कभी कुन्ती बन अपनी वेदना स्वयं सह जाती है । कभी विदुषि बन ज्ञानपुंज जलाती है । कभी राधा बन प्रेम सिखलाती है । कभी रणभूभि में तलवार लिए लक्ष्मीबाई कहलाती है । कभी कल्पना चावला बन अन्तरिक्ष भ्रमण कर आती है । कभी ज्योतिबाफूले बन घर घर शिक्षा का महत्व बताती है । कभी महादेवी वर्मा बन बृहद साहित्य सृजन कर जाती है । कभी मीरा बन बिष को अमृत कर जाती है । कभी मदर टरेशा बन मनवता की पाठ पढाती है । कभी एनी बेसेन्ट बन सम्पूर्ण जीवन मानवोत्कर्ष पर होम कर जाती है । कभी लता मंगेश्कर बन मनोरम तान सुनाती है । कभी रेखा,हेमा बन अभिनय का लोहा मनवाती है । कभी इन्दरागाँधी बन राजनीति पाठ पढाती है । कभी सुषमा स्वराज बन अन्तराष्ट्रीय मंच पर भी लोहा मनवाती है । कभी प्रतिभा देवी सिंह बन सर्वोच्च सिहांसनारूढ हो जाती है । कभी अरूणिमा सिन्हा बन बुलंद हौसला दिखाती है । अब तो हवाई जहाज भी उडाती है । खेल का मैदान हो या जंग का शत्रु को सर्वत्र धुल चटाती है । खो कर चैन खुद का अपने लाडलो को चैन मयस्सर कराती है । बलिदान के बदौलत इनके समक्ष दुनिया शिश झुकाती है । नारी प्रकृति की अनुपम उपहार है, यही सृष्टि चलाती हैं । सर्वस्व न्योछावर करके भी मुस्कुराती है । विस्तृत भूखंड की यही जन्मदात्री है । कभी माता, कभी बहन, कभी अर्द्धांगिनी कहलाती है । इन्हीं के बदौलत सबको साँसें मिल पाती है । फिर क्यों यही लाचारी और बेबसी की जिन्दगी पाती है? क्यों नहीं ये भी गगन चुम्बी उडान उड पाती है? क्यों अपने भाग्य पर पछताती है? क्यों अपने अस्मद रक्षार्थ गैरो पर आश्रित हो जाती है? देखकर कर वेदना इनकी आँखे छलक जाती हैं।

© सतीश कुमार पांडेय