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नए क़सीदे गढ़ रहे
नफ़े के चक्कर में नुकसान कर बैठ रहे ! विकास पर फिर भी बेशर्म से ऐंठ रहे ?
जानते सब ये दर्द जो बातों में दे बल रहे ! साहेब की कहानी जो किश्तों में ढल रहे ?
जनता के नाम की माला जो जप रहे ! लूट की आग में दिन-रात वो तप रहे ?
नित नये-नये क़सीदे गढ़े ऐसे जा रहे ! हर बात को आड़े-तिरछे पढ़े कैसे जा रहे ?
ऐसा लगे कि देश में संविधान नही हैं ! हमने जो कह दिया बस क़ानून वही हैं ?
© कुमार
