निष्काम कर्म
गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन तू कर्म कर फल को मुझपे छोड़। कैसा कर्म? आसक्तिरहित कर्म, निष्काम कर्म, क्योंकि बिना कर्म करे तेरा शरीर निर्वाह भी नहीं चल सकता है। भगवान कृष्ण कैसे कर्म की बात करते हैं जो कर्मों से मुक्ति दिलाए। भगवत्अर्थ कर्म हम कैसे करें जब हम भगवान को जानते ही नहीं। भगवान ऐसे प्रश्नों के जवाब गीता में दे चुके हैं।
मन, बुद्धि से परे जो अखण्ड आनंद है वह संसार में नहीं मिल सकता है। संसार की वास्तविकता जान कर्म करना तथा उनसे ऊपर उठे रहना ही वह कर्म है जिसे भगवान बता गए। आत्मा की शांति, पूर्णता, प्रेम के निमित्त ही विचरण करना तथा उसी आत्मा को सभी प्राणियों में देखना भी गीता का मुख्य संदेश है। हमारी सभी परेशानियों का समाधान गीता में है।
योगी जानता है कि उसके पूर्व संचित संस्कार जो चित्त में जड़ जमाए हैं ही उसे कर्म के लिए प्रेरित करते हैं। वह अपनी प्रगति ईश्वर की ओर चाहता है इसलिए संसार से विमुख होए बिना जो भी उसे अपनी बुद्धि विवेक से करना चाहिए वह करता है। हम अपना खालीपन उन प्रभू को समर्पित कर सकते हैं। वे ही हमें आश्रय दें क्योंकि ते ही वास्तिवक प्रेम हैं।
गीता ऐसा कुछ भी नहीं कहती कि तुम्हें प्राप्ति कब होएगी। परंतु एक ही अमर, आनंदस्वरूप, पूर्ण आत्मा की बात करती है। उसे पाना बौद्धिक चिंतन से संभव नहीं। परंतु मनुष्य के भीतर कुछ ऐसा है जो सदैव उसे प्रेरणा देता है। कोई उसे अनसुना कर देता है तो कोई उसकी महत्ता को स्वीकार करता है। यही योग है।
© सिद्धार्थ राणा
