पहचान
जिंदगी के पग पग पर, नई पहचान की जहादोजहद। लगे सभी तामीर गढ़ने, कुछ कर दू अजूबा। जीवन दौड़ लगा रही, पहचान कब समाप्त हो। उलटी धारा बह रही है, पहचान की दौड़।
हमारा संसार फैल रहा, इस बाहरी ताम झाम से। जीवन की उलटी धारा में, संतुलन भी संभव। हम अपनी पहचान, विस्तार करें इतना। सांसारिकता का विस्तार ही, जीवन की खोज मानो।
ऐसी पहचान रखे, अहमो ब्रहम्समी साकार हो। छोटी छोटी पहचान, कभी भाषा, जात पात, उच्च नीच। तोड़े इसे, समूल नाश कर ऐसे विचार। हम्ही ब्रह्माण्ड है, तार जुड़े सभी के, सभी एक है।
रखे ऐसी पहचान, सबमें अपना जुड़ाव हो। कोई ना भेद भाव रहे, सभी में मेल मिलाप रहे। करे बुद्धि तीक्ष्ण, पहले अपनी पहचान ब्रह्माण्ड हो। तभी हो सकता सबका कल्याण, मानसिक पहचान सर्वत्र हो।
रास्ते बहुत सारे, पर आधारशिला है योगमय जीवन। पहचान खोते हुए, संसार जीने की कला है यह। अपनी पहचान का विस्तार करे, सर्वत्र, समृद्ध बने। जीवन को अपनी दिशा में बहने दे, सांसारिकता साथ।
जिंदगी के पग पग पर, नई पहचान की जहादोजहद। लगे सभी तामीर गढ़ने, कुछ कर दू अजूबा। जीवन दौड़ लगा रही, पहचान कब समाप्त हो। उलटी धारा बह रही है, पहचान की दौड़।
#पहचान
©#मिथिलेश कुमार
