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Satish Kumar Pandey
Satish Kumar PandeyCourseLiteraturePoetry
10 May 2021·1 min read·

प्राण-कथा और ऐलान

कुछ निकलते प्राण हमें सच्चाई बता गए। अपनी जलती चिताओं के तपन से वे लोकतंत्र की नींव झूलसा गए। देशी गद्दारों के कारण मौत के भेंट चढ़ा मैं, मरणशैया से वे बता गए । कोई कीमत नहीं दीनों के जीवन का, यह एहसास करा गए।

धन के लालची दरिन्दें, हमें मौत के दहलीज पर पहुँचा गए। आतताई मेरे प्रियजनों को तबाही के राह दिखा गए। मौत के मुहाने से लौट न सका मैं, क्योंकि मौत के सौदागर जिन्दगी के साजोसमान अपने तहखाने में छूपा गए।

चिताओं के विदाई में जब करुण वेदना फूटेगा, उस आह के भंवर से कोई नहीं छूटेगा। जब तपन बढ़ेगा जुल्मों-सितम,वेदना का, तो पाषाण का भी कलेजा पिघलेगा। भस्मसात करने को दुराचारियों का साम्राज्य, जलती चिताओं से प्रचंड ज्वाला निकलेगा ।

बताओ वो पैसों के भूखे दरिन्दों, मौत का सौदा कब तक फूले फलेगा? तुम क्या अमरत्व लिए बैठे हो जो तुम्हें मृत्यु कभी नहीं छलेगा? एक रोज जन- जन में क्रांति की ज्वाला उठेगी । होकर कूकृत्यों से त्रस्त, जन ह्रदयों में क्रोधाग्नि फूटेगी।

ये लाशों के ढेर एक रोज तुम्हें कटघरे तक लायेगी । जो आज पनाह दिए बैठे हैं तुम्हें, वे शक्ति तुम्हें नहीं बचा पायेगी । अगर भ्रष्टाचारियों के अदालत में बरी हो जाओगे, तो जनसमूदाय तूझे अपनी फैसला सुनायेगी। एक रोज यह धरा अपराध मुक्त हो जायेगी ।

शांति, सद्भाव, सेवा, संयम, समर्पण, साहस से यह वसुन्धरा उल्लसित हो जायेगी । सत्कर्म ,सद्ज्ञान की धार से कण- कण पोषित हो जायेगी । एक रोज हर चेहरे पर मुस्कान आयेगी।

©सतीश कुमार पांडेय