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प्रेम
प्रेम न देखे लाभ हानि प्रेम है बहता पानी जिन ऊंचाइयों से वह आता
उसका परिचय पुलकित हमें कर दे जाता खोल देता तार अपने जोड़ लेता खुले आसमान से न बाधा कुछ देखता
सभी में सरलता से घुल जाता है दर्शन अपने अकेलेपन का न मलिन संसार में कभी होता
न साधना तुझसे बड़ी अन्य दिखती न प्रार्थना भगवान स्वीकार कर कोई न पाप हो यह खुद से कि भूल प्रेम रस दूषित हों परिस्थितियों से
