प्रेम
प्रेम कला है वर्तमान में जीने की प्रेम लय है प्रकृति की प्रेम ही बोध है प्रेम ही कर्म है प्रेम ही भक्ति से योग है प्रेम ही मेरे अंदर, मेरे बाहर है प्रेम ही जीवों का आधार है प्रेम बचपन है, प्रेम यौवन है प्रेम ही समूचा जीवनक्रम है प्रेम ही तो आकाश, नदी सब जगह है प्रेम ही तो सबका एक समागम है प्रेम कुंजी है जन्मों जन्मों की प्रेम शक्ति है करोड़ों सूर्यों की प्रेम उमंग है नटखट बालक की प्रेम सूरत है अजर अमर आत्मा की प्रेम रस है संसार का प्रेम रंग है अपने स्वरूप का प्रेम ऊर्जा है दिशा मांगती प्रेम उलझन है समाधान चाहती प्रेम परमेश्वर है प्रेम चोट है दुष्प्रव्रतियों पर प्रेम संचार है सद्भावना का प्रेम उल्लास है जीवन भर का प्रेम दर्शन है अनेकों लोकों का प्रेम रचा है समस्त आकाशगंगाओं में प्रेम पुकार है जगतजननी की प्रेम जरूरत है पीड़ित संसार की प्रेम सर्वस्व है अंर्तवेदना में प्रेम ही लक्ष्य है प्रेम ही पथ है प्रेम ही परमेश्वर है
© सिद्धार्थ राणा
