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Satish Kumar Pandey
Satish Kumar PandeyCourseLiteraturePoetry
12 Feb 2022·1 min read·

राही

तू चला चल बन के राही, चाहतों का स्वप्न सजा। आने दो वेदना के सैलाब, तभी पाओगे मंजिल पाने का मजा।

बिन चरागों के जले, कब जगमगाया है जहां ? झोक दो साहस इसकदर, सफलता माँगें, तेरे घर का पनाह।

सामर्थ्य खुद का जान लो तुम, तुझमें समाहित शक्ति अथाह। चीर नाकामयाबी का वक्ष, विजयश्री का बना दो राह। गगनचुम्बी उडान की चाहत संजो, अपने पंख फैला। भरों हूँकार ऐसा, हो उठे धमनियों में शौर्य प्रवाह। तू चला चल बन के राही, सामर्थ्य सारे झोक के। बन न पाया कोई तूफान ऐसा, जो हौसले को रोक दे।

© सतीश कुमार पाण्डेय