राम
यूँ कहूं तो ये चंदा एक बहाना हैं, जन-जन तक प्रभु राम पहुंचाना हैं !
न कोई होड़ हैं इसमें न कोई जोर ही मानो, हर किसी को बस यहाँ समझो मनाना हैं !
क्या होगा हमारे हजार-पांच सौ लेकर, असल उद्देश्य तो बस माहौल बनाना हैं !
चुनावों पर ये चर्चे तो करेंगें फिर कभी आकर, अभी श्रीराम के खातिर अदद इक घर बनाना हैं !
करेंगे फिर वही बातें धरेंगे रूप बहुतेरे, पहर अंतिम को भी तो मन मंदिर सजाना हैं !
दुबारा कुछ नहीं मिलना सिवा कुछ नेक कर्मों के, मिले अवसाद ना फिर से जतन अंतिम लगाना हैं !
मिले थे कृष्ण जो बनकर वही फिर बुद्ध बन बैठे, हमें कल्कि से मिलने में अभी खुद को लगाना हैं !
मिलेंगे फिर वहीं हमसे जहाँ से छोड़ आए हैं, प्रभु श्रीराम को बस हर युगों तक गुनगुनाना हैं !
©# कुमार
